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गरीबी के आंकड़ों में हेराफेरी…

Admin द्वारा Admin
October 14, 2025
in राष्ट्रीय
Reading Time: 1 min read
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भारत में आंकड़ों की दुनिया में गजब का विरोधाभास है।
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भयंकर गरीबी की दौर से गुजर रहा भारत

नई दिल्ली। ब्यूरो
आज देश भयंकर गरीबी की गौर से गुजर रहा है लेकिर सरकार विगत कई वर्षों से गरीबी कम होने का दावा करते आ रही है। इसके लिए सरकार रिपेर्ट जारी कर रही है और आंकड़ा भी पेश कर रही है। असल में किसी भी आंकड़ों में हेराफेरी करना सरकार के लिए कोई नहीं बात नहीं है। वह आंकड़ा चाहे हत्या-बलात्कार का हो या गरीबी का हो। सरकार ने हमेशा छिपाने का ही काम किया है। जैसे आज एक बार फिर से गरीबी के आंकड़ों में हेराफेरी किया गया है। इससे साबित होता है कि आंकड़ों में हेराफेरी करना सरकार के लिए बाएं हाथ काम है।
विश्व बैंक ने अप्रैल, 2025 में अपनी एक रिपोर्ट में भारत में गरीबी रेखा के नीचे गुजारने वाले लोगों की आबादी में भारी कमी आने की बात कही थी। बाद में पीएम नरेन्द्र मोदी ने कई बार सार्वजनिक मंच से इस रिपोर्ट का हवाला दिया। अब भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की हालिया बुलेटिन रिपोर्ट (सितंबर 2025) में भी इस बात की तरफ इशारा किया गया है कि भारत में 2011-12 से 2022-23 के बीच गरीबी के स्तर में कमी दर्ज की गई है। आरबीआई के पूर्व गर्वनर सी रंगराजन की अध्यक्षता में गठित समिति की पद्धति पर आधारित इस आकलन रिपोर्ट के मुताबिक गरीबी घटाने में बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा जैसे राज्यों ने बेहतर प्रदर्शन किया है। इसमें बिहार का प्रदर्शन सबसे उल्लेखनीय है क्योंकि इसने ना सिर्फ उत्तर भारत के राज्यों बल्कि महाराष्ट्र, गुजरात जैसे विकसित राज्यों के मुकाबले भी बेहतर रहा है।

गरीबी का हकीकत आंकड़ा
हाल में ही वर्ल्ड बैंक ने भारत की गरीबी पर अपने रिपोर्ट में जिक्र किया है। जिस रिपोर्ट में यह निकल कर आया है कि भारत में केवल 5.75 फीसदी आबादी गरीबी में जी रही है। वर्ल्ड बैंक ने अपने रिपोर्ट में परचेसिंग पावर पैरेटी के आधार पर तीन डॉलर प्रतिदिन एक्सपेंडिचर लेवल की पॉवर्टी लाइन खींची है। इस आधार पर गणना कर यह बताया है कि भारत में 5.75 फ़ीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। क्योंकि वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट ने परचेसिंग पावर पैरिटी के आधार पर $3 की गणना की है तो यह 62 रुपए निकाल कर आता है। मतलब भारत में प्रतिदिन 62 रुपए से कम खर्च कर सकने वाली आबादी केवल 5.75 प्रतिशत है। वर्ल्ड बैंक के इसी रिपोर्ट से यह भी निकल कर आया है कि प्रतिदिन 171 रुपए से कम खर्च करने की क्षमता रखने वाली आबादी भारत में 82 प्रतिशत है। 200 प्रतिदिन से कम खर्च करने की क्षमता रखने वाली आबादी 88 से 89 प्रतिशत है। यानी भारत में भयंकर गरीबी मौजूद है। यह गरीबी उन दावों से बिल्कुल उलट स्थिति बताती है, जहां भारतीय जनता पार्टी वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट का हवाला देकर यह कह रही है कि भारत में बहुत बड़े लेवल पर गरीबी कम हुई है।
साल 2011-12 से लेकर अब तक भारत में पॉवर्टी लाइन अपडेट नहीं हुई है। अगर मोदी सरकार को गरीबों को गरीबी से बाहर निकालने की चिंता होती तो इसके लिए पॉवर्टी लाइन बनाती। लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार में अब तक पॉवर्टी लाइन का निर्धारण ही नहीं हुआ। इससे पता चलता है कि मोदी सरकार गरीबों को लेकर गंभीर नहीं है। अब सवाल है कि जब पॉवर्टी लाइन भारत के पास है ही नहीं, भारत सरकार ने बनाया ही नहीं है तो फिर वर्ल्ड बैंक ने कैसे कह दिया कि साल 2011-12 में जो 27 प्रतिशत गरीबी थी वह कम होकर 5.75 प्रतिशत हो गई है?
असल में वर्ल्ड बैंक ने भारत जैसे देशों के लिए खुद ही एक पॉवर्टी लाइन क्रिएट की है। यह पॉवर्टी लाइन परचेजिंग पावर पैरिटी एक्सचेंज रेट के आधार पर है। $3 डेली परचेजिंग पावर पैरिटी एक्सचेंज रेट के आधार पर रुपए में पैसा कन्वर्ट करने पर तकरीबन 62 रूपये होता है। यानी प्रतिदिन 62 रूपये से कम खर्च की क्षमता रखने वाले लोगों को भारत में गरीबी की हालात में रखा गया है। आज शहर में 62 में 1 लीटर अमूल का दूध तक नहीं मिलेगा। अब कैसे कहा जा सकता है कि भारत में गरीबी का आंकड़ा कम हुआ है?

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